सी बकथॉर्न क्या है? हिंदी में नाम, खेती, दाम और इस्तेमाल
हिमालय की कांटेदार झाड़ी और उसके नारंगी बेर: नाम, खेती, तुड़ाई, दाम और कारोबार, सरकारी सोर्स से, आसान हिंदी में।

सीधा जवाब
सी बकथॉर्न का हिंदी में कोई एक तय नाम नहीं है; लोग इसे सी बकथॉर्न ही कहते हैं, लद्दाख में इसे त्सेरमंग या लेह बेरी कहते हैं, और हिमालय में छरमा जैसे लोकल नाम हैं। ये ठंडे हिमालय की कांटेदार झाड़ी है जिस पर नारंगी बेर लगते हैं। भारत में करीब 13,000 हेक्टेयर में उगता है, 70% से ज़्यादा लद्दाख में, और हर साल सिर्फ़ करीब 600 टन बेर तोड़े जाते हैं। तुड़ाई सितंबर से नवंबर तक होती है। 2026 में लद्दाख ने किसानों के बेर का न्यूनतम दाम ₹300 किलो कर दिया, जो 2025 में ₹150 था।
हिंदी में नाम
सी बकथॉर्न को हिंदी में क्या कहते हैं?
सीधी बात: हिंदी में इसका कोई एक पक्का नाम नहीं है। हमने जितने सरकारी और रिसर्च वाले सोर्स पढ़े, किसी में कोई तय हिंदी नाम नहीं मिला। आम बोलचाल में लोग इसे सी बकथॉर्न ही कहते हैं। पर पहाड़ों में इसके अपने पुराने नाम हैं:
- लद्दाख में: लद्दाखी में त्सेरमंग (Tsermang) और सस्तालुलु, और अंग्रेज़ी में लेह बेरी (Leh Berry) (Flowers of India)।
- हिमाचल और बाकी हिमालय में: छरमा (Chharma), अमली (Amli), सरिला, तिरकु और सरमा। ये नाम FRLHT (ENVIS) ने दिए हैं, पर कौन-सा नाम किस बोली का है, ये उसमें नहीं लिखा।
- वैज्ञानिक नाम: हिप्पोफ़ी रैम्नॉइडीज़ (Hippophae rhamnoides)। NIFTEM की रिपोर्ट इसे "ठंडे रेगिस्तान का सोना" (cold desert gold) कहती है।
यही गाइड अंग्रेज़ी में यहाँ है: Sea buckthorn in India: the complete guide।
एक नज़र में
भारत में सी बकथॉर्न: ज़रूरी बातें
| सी बकथॉर्न | |
|---|---|
| पौधा | कांटेदार झाड़ी, नारंगी रंग के छोटे बेर; परिवार Elaeagnaceae |
| भारत में किस्में | तीन: H. rhamnoides, H. salicifolia, H. tibetana |
| भारत में रकबा | करीब 13,000 हेक्टेयर (NIFTEM-थंजावुर की मॉडल DPR) |
| हर साल तुड़ाई | करीब 600 टन बेर |
| कहाँ उगता है | लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल; 2,000 से 4,300 मीटर ऊँचाई पर |
| सबसे ज़्यादा | लद्दाख, कुल रकबे का 70.9% |
| तुड़ाई का समय | सितंबर से नवंबर के आख़िर तक |
| लद्दाख में किसान को दाम (2026) | कम से कम ₹300 किलो, 2025 में ₹150 था (UT लद्दाख, 18 सितंबर 2026) |
| GI टैग | "Ladakh Sea Buckthorn", नवंबर 2023 में |
| पूरी दुनिया में | 52 देशों में 2.33 मिलियन (23.3 लाख) हेक्टेयर, इसमें करीब 21 लाख हेक्टेयर अकेले चीन में (Wang et al. 2022) |
ये आंकड़े 21 अक्टूबर 2026 को पढ़े गए। IndianAgri सी बकथॉर्न न उगाता है, न बेचता है; हम ख़रीदार, बेचने वाले और यूनिट लगाने वालों को आपस में जोड़ते हैं।
किस्में
भारत में मिलने वाली तीन किस्में
NIFTEM की DPR (पेज 5) के हिसाब से:
| किस्म | पौधा | ऊँचाई | 100 बेर का वज़न | रंग |
|---|---|---|---|---|
| H. rhamnoides | झाड़ी या छोटा पेड़ | 2–5 मीटर | 8–27 ग्राम | लाल से नारंगी |
| H. salicifolia | पेड़ | 4–9 मीटर | 30–35 ग्राम | पीला |
| H. tibetana | छोटी झाड़ी | 0.2–0.6 मीटर | 15–21 ग्राम | नारंगी, हरी धारियों वाला |
लद्दाख में जो बेर तोड़ा और प्रोसेस किया जाता है, वो H. rhamnoides है।
कहाँ उगता है
किस राज्य में कितना सी बकथॉर्न है
| राज्य / UT | रकबा (हेक्टेयर) | हिस्सा |
|---|---|---|
| लद्दाख | 9,267 | 70.9% |
| उत्तराखंड | 2,000 | 15.4% |
| हिमाचल प्रदेश | 1,000 | 7.6% |
| सिक्किम | 800 | 6.1% |
| कुल | 13,067 | 100% |
सोर्स: NIFTEM की DPR। लद्दाख का आंकड़ा सैटेलाइट से निकाला गया है: 7,184 हेक्टेयर में सिर्फ़ सी बकथॉर्न, और 2,083 हेक्टेयर में दूसरे पौधों के साथ मिला-जुला। अरुणाचल का नाम तो है, पर उसका आंकड़ा नहीं।
दो बातें ध्यान रखिए। पहली, NIFTEM ख़ुद कहता है कि पैदावार का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है; 600 टन वो है जो तोड़ा जाता है, जो उगता है वो नहीं। औसत साल में लद्दाख के कुल बेर का 5% से भी कम तोड़ा जाता था। दूसरी, आंकड़े हर जगह एक जैसे नहीं हैं: दिसंबर 2025 में लद्दाख के उपराज्यपाल ने लद्दाख का हिस्सा "करीब 64%" बताया था (UT लद्दाख)। पर दोनों में लद्दाख ही सबसे आगे है।
तुड़ाई
कब और कैसे तोड़ा जाता है, एक पौधा कितना देता है
बेर अगस्त से अप्रैल तक झाड़ी पर लगे रहते हैं, पर तुड़ाई सितंबर से नवंबर के आख़िर तक होती है, जब रंग पक जाता है और रस में मिठास 12 °Brix तक पहुँच जाती है (DPR, पेज 7)। लद्दाख ने 2026 का सम्मेलन 18–19 सितंबर को इसीलिए रखा, क्योंकि वही तुड़ाई का पीक टाइम है।
तोड़ना मुश्किल क्यों है? बेर बहुत कांटेदार डालियों पर चिपके रहते हैं। DPR दो तरीके बताती है: डालियों को पीटकर बेर गिराना, या फल वाली डालियाँ तोड़ लेना। सितंबर 2026 में उपराज्यपाल ने कहा कि इसी वजह से हर साल करीब 85% फ़सल बर्बाद हो जाती है, सिर्फ़ 15% काम में आती है, और इस साल कम से कम 50% का टारगेट रखा (UT लद्दाख)।
कितना निकलता है (DPR, पेज 7–8):
| तरीका | पैदावार |
|---|---|
| जंगली पौधा | 1–2 किलो साल का |
| आम झाड़ी | 2–3 किलो |
| कुदरती झाड़ियाँ | 750–1,500 किलो प्रति हेक्टेयर |
| शेल्टर-बेल्ट में लगाया | 4–5 टन प्रति हेक्टेयर |
| बाग़ (ऑर्चर्ड) | 10 टन प्रति हेक्टेयर तक |
| विदेशी ज़्यादा पैदावार वाली किस्में | 10–15 किलो प्रति पौधा |
ताज़ा बेर जल्दी ख़राब होते हैं। तोड़ते ही इन्हें 4–6 °C पर ठंडा करना चाहिए, और ज़्यादा दिन रखना हो तो फ़्रीज़ (IQF) करना पड़ता है।
खेती
सी बकथॉर्न की खेती कैसे करें
DPR में ICAR के तय तरीके दिए गए हैं (पेज 6–7)। छोटे में:
- पौध: पकी लकड़ी की कटिंग से। लेह में DRDO की लैब DIHAR हर साल 15,000–20,000 जड़ वाले पौधे तैयार करती है।
- दूरी: 4 मीटर × 2 मीटर, और 2 × 2 × 2 फ़ुट का गड्ढा।
- खाद: हर पौधे को 20 किलो गोबर की खाद (DPR दूसरी जगह 20–40 किलो प्रति थाला भी लिखती है), और लगाते वक़्त 50 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर।
- खरपतवार: काली पॉलीथीन की मल्चिंग, या आर्टेमिसिया की मल्च।
- छंटाई: 10–25% तक; 25% से ज़्यादा काटेंगे तो फ़सल घटेगी।
- मौसम: −43 °C से 40 °C तक झेल लेता है (DPR के पेज 2 पर ये आंकड़ा ग़लत छपा है)।
लद्दाख का बाग़बानी विभाग नीमू (Nimoo) के सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस में सी बकथॉर्न की नर्सरी और डेमो बाग़ चलाता है, जिसे भारत सरकार ने ₹7.89 करोड़ में मंज़ूर किया (UT लद्दाख)।
क्या मैदानों में उग सकता है? ये कुदरती तौर पर 2,000–4,300 मीटर पर उगता है। मैदानी इलाकों का कोई सरकारी ट्रायल नतीजा हमें नहीं मिला, इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि वहाँ फ़सल देगा।
क्या-क्या बनता है
सी बकथॉर्न से क्या बनता है, और दाम क्या है
लगभग हर हिस्सा काम आता है: गूदे से जूस, कॉन्सन्ट्रेट और सिरप; गूदे और बीज से तेल; सूखे बेर; और पत्तियों से हर्बल चाय। कॉस्मेटिक्स में इसका तेल इस्तेमाल होता है।
100 किलो बेर से क्या निकलता है (DPR, पेज 8–9):
| पल्पर से | कितना |
|---|---|
| गूदा (पल्प) | करीब 74% |
| खली (छिलका और बीज) | करीब 24% |
| धूप में सुखाएँ तो सूखे बेर | 100 किलो से करीब 33.25 किलो (एक महीने से ज़्यादा लगता है) |
बीज सूखी खली से अलग किया जाता है; बीज का तेल आम तौर पर सुपरक्रिटिकल CO₂ से निकाला जाता है।
दाम की बात. दो तरह के आंकड़े हैं, और दोनों अलग हैं:
- लद्दाख में किसान को बेर का दाम: 2026 में कम से कम ₹300 किलो, 2025 में ₹150 था। ये ऐलान उपराज्यपाल ने 18 सितंबर 2026 को किया (UT लद्दाख)।
- NIFTEM की DPR में लिखे दाम (PDF दिसंबर 2025 की है, पर दामों पर कोई तारीख़ नहीं): पल्प ₹110–120 किलो, साफ़ बीज ₹250–300, छिलका ₹20–30, सूखे बेर ₹200–300 किलो।
ये आज का मंडी भाव नहीं है। 8 अक्टूबर 2026 को लद्दाख के मुख्य सचिव ने ख़ुद कहा कि अलग-अलग ख़रीदार अलग दाम दे रहे हैं, और ख़रीद के सिस्टम की जाँच करने को कहा (UT लद्दाख)।
ख़रीदारों के लिए जूस के ब्रांड-वार दाम हमारी सहयोगी साइट पर हैं: sea buckthorn products। प्रोसेसिंग यूनिट कैसे लगती है और कितने की पड़ती है: sea buckthorn processing unit।
बेर में क्या है
सी बकथॉर्न के बेर में क्या होता है
सी बकथॉर्न में विटामिन C काफ़ी होता है, और इसके नरम गूदे में तेल होता है, जो फलों में कम ही देखने को मिलता है। पर आंकड़े किस्म, जगह और पकने के हिसाब से बहुत बदलते हैं:
- विटामिन C: अलग-अलग स्टडी में 52.86 से 896 mg प्रति 100 ग्राम; लद्दाख के बेरों में 275 mg प्रति 100 ग्राम (Wang et al. 2022)।
- फ़ैट: बेर में मुख्य फ़ैटी एसिड पामिटिक, पामिटोलिक (ओमेगा-7) और ओलिक एसिड हैं (वही रिव्यू)।
- NIFTEM की टेबल (प्रति 100 ग्राम): पानी 91 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 5 ग्राम, फ़ैट 2 ग्राम, प्रोटीन 1 ग्राम, फ़ाइबर 0.5 ग्राम, विटामिन C 909 mg, विटामिन A 1,500 µg, विटामिन E 3 mg, पोटैशियम 420 mg, सोडियम 6 mg। उसी पेज पर DPR का टेक्स्ट विटामिन C और E के अलग आंकड़े (600 mg और 160 mg) देता है, तो किसी एक नंबर पर आँख बंद करके भरोसा मत कीजिए।
IndianAgri सी बकथॉर्न से सेहत के किसी फ़ायदे का दावा नहीं करता। पैकेट या रिपोर्ट में लिखे दावे साबित करना बेचने वाले का काम है।
दुनिया में
दुनिया में सी बकथॉर्न
इंटरनेशनल सीबकथॉर्न एसोसिएशन की 2020 की रिपोर्ट (Wang et al. 2022 में) के हिसाब से दिसंबर 2020 तक 52 देशों में 23.3 लाख हेक्टेयर में सी बकथॉर्न था, जिसमें करीब 21 लाख हेक्टेयर अकेले चीन में। NIFTEM की DPR एक पुराना मोटा आंकड़ा देती है: करीब 30 लाख हेक्टेयर, जिसका 90% चीन, मंगोलिया, रूस, उत्तरी यूरोप और कनाडा में, और चीन सबसे बड़ा उत्पादक।
यानी भारत के 13,000 हेक्टेयर दुनिया के 1% से भी कम हैं। लद्दाख अब मंगोलिया से सीखना चाहता है: सितंबर 2026 में लेह के सम्मेलन में मंगोलिया की UVS Seabuckthorn Producer Association की प्रमुख आईं, और मुख्य सचिव ने मंगोलिया का मॉडल पढ़ने को कहा (UT लद्दाख)।
दुनिया की कुल पैदावार (टन में) का FAO जैसा कोई सरकारी आंकड़ा हमें नहीं मिला, इसलिए हम वो नहीं दे रहे।
सरकार और संस्थान
भारत में सी बकथॉर्न पर कौन काम कर रहा है
- GI टैग: "Ladakh Sea Buckthorn" को नवंबर 2023 में Class 31 में GI मिला; रजिस्टर्ड मालिक है UT लद्दाख का उद्योग और वाणिज्य विभाग (Voice of Ladakh)। GI रजिस्ट्री का अपना रिकॉर्ड हम नहीं खोल पाए।
- ODOP और PM-FME: सी बकथॉर्न लेह ज़िले का "एक ज़िला एक उत्पाद" (ODOP) है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की PM-FME स्कीम में ODOP वाले उत्पादों पर ख़ास ज़ोर है।
- DIHAR (DRDO), लेह: इस लैब ने बेर की प्रोसेसिंग की तकनीकें बनाईं और कंपनियों को लाइसेंस दीं, जैसे 2015 में पतंजलि आयुर्वेद को।
- सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस, नीमू: 4 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ।
- राष्ट्रीय सेंटर का प्रस्ताव: केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने नुब्रा घाटी में "नेशनल संजीवनी रिसर्च सेंटर" बनाने पर विचार के लिए कमेटी बनाई है।
- 2026 के सम्मेलन में: CSIR-IHBT (पालमपुर), NIFTEM, KVK लेह, भारतीय पैकेजिंग संस्थान और APEDA (एक्सपोर्ट पर)।
कारोबार
अभी लद्दाख का बेर कौन प्रोसेस कर रहा है
- Halman Apricots, कारगिल ने 1 नवंबर 2025 को 4.5 टन सूखे बेर चंडीगढ़ भेजे, 6 टन और भेजने थे, और उस साल करीब 35 टन पल्प बनाया (UT लद्दाख)।
- Rabbani Agri Processing Unit, सांकू (कारगिल) ने 12 अक्टूबर 2026 को 20 टन पल्प की आख़िरी खेप दिल्ली भेजी, Well with India Pvt. Ltd. के साथ (UT लद्दाख)।
सितंबर 2026 के सम्मेलन में 20 ख़रीदार और करीब 120 MSME उद्यमी और स्वयं सहायता समूह आए। हर जगह से एक ही बात आती है: माँग की कमी नहीं, कमी है बेर तोड़ने, इकट्ठा करने और गाँव में ही पल्प बनाने की।
ख़रीदें, बेचें या यूनिट लगाएँ
बेर बेचने हैं, पल्प ख़रीदना है या यूनिट लगानी है?
IndianAgri ख़ुद सी बकथॉर्न का कारोबार नहीं करता, बस लोगों को आपस में जोड़ता है।
लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम या अरुणाचल में बेर तोड़ते या उगाते हैं? अपने बेर, पल्प या बीज लिस्ट कीजिए: क्या है, इस सीज़न में कितना होगा, गाँव या शहर, ऑर्गेनिक सर्टिफ़िकेट है या नहीं, और आपसे कैसे बात करें।
पल्प, जूस, बीज या तेल ख़रीदना है? हमें लिखिए: कौन-सा प्रोडक्ट, कैसी क्वालिटी (Brix, तेल %, ऑर्गेनिक या जंगली), हर महीने या सीज़न में कितना, पैकिंग, शहर या देश।
प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का सोच रहे हैं? मदद माँगिए: प्रोजेक्ट रिपोर्ट, मशीनें और PM-FME का आवेदन। हम तैयारी में मदद करते हैं; सब्सिडी देना या न देना स्कीम के अधिकारियों का फ़ैसला है।
या सीधे WhatsApp कीजिए। हमारी टीम एक कामकाजी दिन में जवाब देती है। कोई आंकड़ा ग़लत दिखे तो बताइए।
ये क्यों ज़रूरी है
सी बकथॉर्न के पल्प, जूस और तेल की माँग, जितना बेर तोड़ा जाता है उससे कहीं ज़्यादा है; लद्दाख के मुताबिक़ 85% फ़सल झाड़ियों पर ही रह जाती है। सरकारी दाम, GI टैग और छोटे सीज़न वाली इस फ़सल में बेर इकट्ठा करने, पल्प बनाने या ख़रीदने वालों के लिए अच्छा मौका है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सी बकथॉर्न को हिंदी में क्या कहते हैं?
हिंदी में इसका कोई एक तय नाम नहीं है; लोग इसे सी बकथॉर्न ही कहते हैं। लद्दाख में इसे त्सेरमंग (Tsermang) या लेह बेरी कहते हैं, और हिमालय में छरमा और अमली जैसे लोकल नाम भी हैं।
भारत में सी बकथॉर्न कहाँ उगता है?
ठंडे, ऊँचे हिमालय में, 2,000 से 4,300 मीटर पर: लद्दाख, हिमाचल (लाहौल-स्पीति, किन्नौर), उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल। NIFTEM की DPR के हिसाब से भारत में करीब 13,000 हेक्टेयर रकबा है।
सबसे ज़्यादा सी बकथॉर्न किस राज्य में है?
लद्दाख में: 9,267 हेक्टेयर, यानी 70.9%। फिर उत्तराखंड (2,000 हे.), हिमाचल (1,000 हे.) और सिक्किम (800 हे.)।
सी बकथॉर्न का दाम क्या है?
UT लद्दाख ने 2026 में किसानों के बेर का न्यूनतम दाम ₹300 किलो रखा है, 2025 में ₹150 था (18 सितंबर 2026 का ऐलान)। NIFTEM की DPR में बिना तारीख़ के दाम हैं: पल्प ₹110–120 किलो, साफ़ बीज ₹250–300, सूखे बेर ₹200–300 किलो।
सी बकथॉर्न कब तोड़ा जाता है?
सितंबर से नवंबर के आख़िर तक। लद्दाख में सितंबर तुड़ाई का पीक टाइम है।
सी बकथॉर्न का जूस कैसे बनता है?
बेर साफ़ करके धोए जाते हैं, पल्पर में गूदा (करीब 74%) अलग होता है, क्रीम सेपरेटर तेल वाली क्रीम निकालता है, फिर छानकर चीनी-पानी मिलाते हैं, बोतल भरते हैं और 95 °C पर 3 मिनट पाश्चराइज़ करते हैं। ये NIFTEM की मॉडल DPR का तरीका है।
क्या सी बकथॉर्न मैदानों में उग सकता है?
ये 2,000–4,300 मीटर पर कुदरती तौर पर उगता है। मैदानी इलाकों का कोई सरकारी ट्रायल नतीजा हमें नहीं मिला, इसलिए हम पक्का नहीं कह सकते।
क्या सी बकथॉर्न और लेह बेरी एक ही हैं?
हाँ। लेह बेरी लद्दाख में सी बकथॉर्न का ही अंग्रेज़ी नाम है। "Ladakh Sea Buckthorn" को नवंबर 2023 में GI टैग मिला।
दुनिया में सबसे ज़्यादा सी बकथॉर्न कहाँ होता है?
चीन में। 2020 में दुनिया के 23.3 लाख हेक्टेयर में से करीब 21 लाख हेक्टेयर चीन में थे (इंटरनेशनल सीबकथॉर्न एसोसिएशन)।
Source
- NIFTEM-Thanjavur, model DPR: Processing of Sea Buckthorns Beverages (PM-FME), PDF dated Dec 2025
- UT Ladakh: ₹300/kg न्यूनतम दाम, International Sea Buckthorn Conclave, 18 Sep 2026
- UT Ladakh: Conclave concludes, 19 Sep 2026
- UT Ladakh: Chief Secretary on seabuckthorn strategy, 8 Oct 2026
- UT Ladakh: Centre of Excellence, Nimoo, 4 Dec 2025
- UT Ladakh: dried seabuckthorn from Kargil, 1 Nov 2025
- UT Ladakh: pulp consignment from Sankoo, 12 Oct 2026
- Wang Z. et al. (2022), Frontiers in Nutrition 9 (ISA 2020 figures)
- FRLHT ENVIS: Hippophae rhamnoides, vernacular names
- Flowers of India: Leh Berry
- Voice of Ladakh: GI tag, 17 Nov 2023
- Photo: Karunakar Rayker, Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0 (cropped)
21 अक्टूबर 2026 को पढ़ा गया। रकबा, किस्में, खेती, पैदावार और बिना तारीख़ के दाम NIFTEM-थंजावुर की PM-FME मॉडल DPR (दिसंबर 2025) से; 2026 का दाम, बर्बादी, सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस और खेपें UT लद्दाख की प्रेस रिलीज़ से; दुनिया का रकबा और बेर में क्या है, Wang et al. (2022) से। किसी सोर्स में तय हिंदी नाम नहीं मिला। IndianAgri सेहत का कोई दावा नहीं करता और सी बकथॉर्न का कारोबार नहीं करता। फ़ोटो: Karunakar Rayker, Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0।
Edited by Devendra Kumar Jha. How we report, source and correct: editorial policy. Spotted an error? Tell us.


